पानी , तू इतना महंगा कैसे हो गया ?

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    पानी , तू इतना महंगा कैसे हो गया ?

     

    पानी तू कितना सस्ता है जब तुझे बहा दिया जाता है गाडी साफ़ करने में, नहाने में , साफ़ सफाई में ?

    पर तू इतना महंगा क्यों हो गया , जब में धुप में चलता हु , मुझे प्यास लगती है और , जब में तुझे खरीद के पीता हुआ ? तेरी कीमत का अहसास जरूरत में ही क्यों होता है ?

    पानी तू ऐसा क्यों करता है ? तू ही बता तू सस्ता भी है और महंगा भी ?

    तेरी कोई रंग भी नही, क्यों ?

    क्यों तू हर एक के रंग में रंग जाता है ?

    क्यों है तू जीवन का दूसरा नाम ?

    पानी, तू क्यों है जरूरत मेरी फसलो की ?

    क्यों है तू जरुरत पशु – पक्षिओ की ?

    पानी , क्या है तेरा धर्म ? जात क्या है तेरी ?

     

    पानी ; ना कोई जात मेरी, ना है कोई धर्म. करता हु सेवा सबकी हर वक़्त, हरदम .

    रूप मेरा वही जो तू दे दे प्यार से, उसी के रंग में रंग जाऊ जो जैसा दे प्यार मुझे .

    जीवन का हु दूसरा नाम, क्युकी कर्मो से ही अपने बना हु इतना महान , रहता सदा धरती पे न है मुझे अभिमान .

    सुन मेरी तू ये बात ऐ प्यारे इन्सान , तेरे कर्मो को न देख तेरी प्यास बुझाऊंगा , कर तू भी यह वादा , के इन्सान बन के दिखाएगा .

    तुझ में है जीवन , में तो बहता एक धार हु , फिर भी आता सब के काम हु . तो क्यों पत्थर हो जाता जबकि दिल तेरे ही पास है , देख किसी की तकलीफ को पलट जाता, और कहता खुद को इन्सान है ?

    आज हु शायद कल ना होऊ गा , जीवन की डोर को संग अपने ले जाऊंगा , बचा ले मुझे अपने बच्चो के लिए , एक बार गया , फिर न वापिस आउंगा … फिर न वापिस आउंगा  पर जाते जाते तेरी प्यास बूझा जाऊंगा ,,,,तेरी प्यास बूझा जाऊंगा …..पर ….कल ना आऊंगा …पर ……कल ना आउंगा

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