आम का पेड़

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    तू याद है मुझे आज भी , तेरा वोह मीठा फल भी याद है मुझे, घनी धुप में तेरी छाव याद है मुझे , तुझसे लिपट के मेरा रोना याद है मुझे , तेर ऊपर चढ़ छुप जाना याद है मुझे , तुझ से बेठ घंटो बातें करना याद है मुझे , तेरी छाया में बेठ खेलना याद है मुझे , तेरी छाया में सोना याद है मुझे , तेरी छाव में बेठ पढना याद है मुझे , तेरी छाया में बेठ खाना खाना याद है मुझे, तेरी छाया में बेठ माँ से कहानी सुनना याद है मुझे  …….. सब याद है मुझे …सब याद है मुझे

    पर ….

    अब तू मुझे भूल गया ….

    तू मुझ संग शहर नही आया , क्यों तू इतना जिद्दी हो गया , क्यों तू वही धुप में आज भी खड़ा है ? क्यों तूने मेरा कहा नही माना , क्यों तूने नही छोड़ी वोह ज़मीन , तुझसे कहा था मैंने के चल , एक नये शहर जायेगे , तुझे नई ज़मीन दूंगा , यहा क्या रखा है , इतनी धुप में खड़ा रह तुझे मिलता क्या है ?

    धुप , धुल से सने यह खेत , किसके लिए देगा तू यह फल ? किसे देगा तू ये आम पक जाने के बाद , उन्हें ..जो तेरी कदर तक नही करते ? जो तुझ से कभी तेरा हाल चाल भी नही पूछते ?

    अब तू मुझे भूल गया ….मेरे प्यारे आम के पेड़ …. अब तू मुझे भूल गया ….

    “ मैं नही भूला तुझे मेरे दोस्त, तेरा साथ याद  है मुझे, पर मेरा कर्म भी याद है मुझे, सबकी सेवा यही जीवन का कर्तव्य है मेरे . सबको बराबर फल देना बिना किसी भेदभाव , यही धर्म है मेरा . इस मिटटी में जन्मा हु, इसी में मिल जाऊंगा , जो काम करने आया हु , वोह कर के जाउंगा , साथ तेरा भी नही छोड़ूगा , कर्म अपना भी निभा जाउंगा , मरने के बाद भी किसी के चूल्हे में आग दे , रोटी का सुख दे जाऊंगा”

     

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