समाज : दिल, दया और वहशीपन

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    इंसान समाज में रहता है क्योंकि वह एक सामाजिक प्राणी है ये हम सब सदियो से सुनते आ रहे है, और आने वाले समय में भी यही डायलॉग दुनिया वाले मारते रहेगे क्योंकि अब यह सबके मुह चढ़ चूका है, कॉमन हो गया है । सामाजिक प्राणी !

    जिन लोगो के बीच हम रहते है मतलब हमारा समाज, जब भी इन लोगो को देखता हू, सोचता हु , ये सब कितने अलग है, मतलब कोई पैसे कमाने के लिया अपना घर चलाने के लिए कितनी मेहनत करता है और इस इंसान को किसी से कोई लेना देना नही उसे सिर्फ अपना घर चलाना है । दूसरी तरफ वह है जिसे पैसे की कमी नही पर उसका कोई बिज़नस भी नही, किराया आता रहता है, इसका घर चल जाता है । एक और है जो माँ बाप के जोड़े पैसो पे ऐश कर रहा, खर्चा थोडा करता है ताकि पैसा खत्म ना हो जाये, पर काम कुछ नही करता सिर्फ आवारागर्दी करता है ।

    इसी टोली में वह भी है जो, जो कुछ भी कमाता है उडा देता है, दारू में, नशे में । एक और है जो कुछ नही करता, जिसके पास पैसा भी नही है, पर वह कुछ करना भी नही चाहता, नौकरी कर मालिक की गाली उसे पसंद नही, दिमागी तौर पर वह असमंजस में है के क्या करू अपनी ज़िन्दगी में मैं ? दिमागी तौर पर पंगु ये इंसान बुराई का रास्ता चुनता है ।

    इस समाज में हम रहते है यह हर कोई नकाब में रहता है, हर कोई नकाब पहने है, जिसके दिल में जरा सा भी चोर है, वह उजागर हो जाता है जब समय उसे उजागर करने को कहता है, समय बलवान यह मारकर भी सीखाता है, एक्सपेरिमेंट कर के भी सिखाता है, ज्यादा पीछे नही हाल ही में हुआ हरियाणा का जाट आरक्षण का किस्सा उठा के देख लीजिये ।

    मुरथल में गैंग रेप किया समाज में रहने वाले इंसानो ने, इंसान नही वहशी राक्षस थे वो, धिक्कार है ऐसे लोगो पर जो एक माँ एक बेटी एक बहन एक बहू एक देवी की इज्जत को सरे बाज़ार उतार दे । यह भी समाज का ही एक चेहरा है, उसी समाज में वह लोग भी है जिन्होंने इन महिलाओ को सहारा दिया ।

    यही है समाज, जिसमे हम रहते है । इसकी परिभाषा हर किसी के पास अपनी अपनी है, कुछ के पास अच्छी कुछ के के पास बुरी ।

    क्योंकि समाज को अगर आसान शब्दों में कहु तो यह लोगो का झुण्ड है, किसपे विश्वास करु, यह में नही जानता ।

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